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श्रीमद्‌देवीभागवत महापुराण
सप्तमः स्कन्धः
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

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श्रीदेवीविराड्‌रूपदर्शनसहितं देवकृततत्स्तववर्णनम् -
भगवतीद्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा तथा कुण्डलीजागरणकी विधि बताना -


हिमालय उवाच
योगं वद महेशानि साङ्गं संवित्प्रदायकम् ।
कृतेन येन योग्योऽहं भवेयं तत्त्वदर्शने ॥ १ ॥
हिमालय बोले-हे महेश्वरि ! अब आप ज्ञान प्रदान करनेवाले योगका सांगोपांग वर्णन कीजिये, जिसकी साधनासे मैं तत्त्वदर्शनकी प्राप्तिके योग्य हो जाऊँ ॥ १ ॥

श्रीदेव्युवाच
न योगो नभसः पृष्ठे न भूमौ न रसातले ।
ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्योगं योगविशारदाः ॥ २ ॥
देवी बोलीं-यह योग न आकाशमण्डलमें है, न पृथ्वीतलपर है और न तो रसातलमें ही है । योगविद्याके विद्वानोंने जीव और आत्माके ऐक्यको ही योग कहा है ॥ २ ॥

तत्प्रत्यूहाः षडाख्याता योगविघ्नकरानघ ।
कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमात्सर्यसञ्ज्ञकौ ॥ ३ ॥
हे अनघ ! उस योगमें विघ्न उत्पन्न करनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य नामकये छः प्रकारके दोष बताये गये हैं ॥ ३ ॥

योगाङ्गैरेव भित्त्वा तान्योगिनो योगमाप्नुयुः ।
यमं नियममासनप्राणायामौ ततः परम् ॥ ४ ॥
प्रत्याहारं धारणाख्यं ध्यानं सार्धं समाधिना ।
अष्टाङ्गान्याहुरेतानि योगिनां योगसाधने ॥ ५ ॥
अतः योगके अंगोंके द्वारा उन विघ्नोंका उच्छेद करके योगियोंको योगकी प्राप्ति करनी चाहिये । योगियोंके लिये योगसिद्धिहेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-ये आठ अंग बताये गये हैं ॥ ४-५ ॥

अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम् ।
क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ॥ ६ ॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धृति, परिमित आहार और शौच-ये दस प्रकारके यम कहे गये हैं ॥ ६ ॥

तपः सन्तोष आस्तिक्यं दानं देवस्य पूजनम् ।
सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम् ॥ ७ ॥
हे पर्वतराज ! तप, संतोष, आस्तिकता, दान, देवपूजन, शास्वसिद्धान्तोंका श्रवण, लज्जा, सद्‌बुद्धि, जप और हवन-ये दस नियम मेरे द्वारा कहे गये हैं ॥ ७ ॥

दशैते नियमाः प्रोक्ता मया पर्वतनायक ।
पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा ॥ ८ ॥
वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपञ्चकम् ।
ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक्पादतले शुभे ॥ ९ ॥
अङ्गुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः ।
पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम् ॥ १० ॥
पद्मासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, वज्रासन और वीरासन-क्रमश: ये पाँच आसन बतलाये गये हैं । दोनों पैरोंके दोनों शुभ तलवोंको सम्यक् रूपसे जंघोंपर रखकर पीठकी ओरसे हाथोंको ले जाकर दाहिने हाथसे दाहिने पैरके अंगूठेको और बायें हाथसे बायें पैरके अंगूठेको पकड़े; योगियोंके हृदयमें प्रसन्नता उत्पन्न करनेवाला यह पद्मासन कहा गया है । ८-१० ॥

जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले शुभे ।
ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥ ११ ॥
जाँघ और घुटनेके बीचमें पैरके दोनों सुन्दर तलवोंको अच्छी तरह करके योगीको शरीर सीधाकर बैठना चाहिये । इसे स्वस्तिकासन कहा जाता है ॥ ११ ॥

सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्मं सुनिश्चितम् ।
वृषणाधः पादपार्ष्णी पार्ष्णिभ्यां परिबन्धयेत् ॥ १२ ॥
सीवनीके दोनों ओर दोनों एड़ियोंको अण्डकोषके नीचे अच्छी तरह रखकर दोनों पैरोंको हाथोंसे पकड़कर बैठना चाहिये । योगियोंके द्वारा सम्यक् पूजित यह आसन भद्रासन कहा गया है । ॥ १२ ॥

भद्रासनमिति प्रोक्तं योगिभिः परिपूजितम् ।
उर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्य जान्वोः प्रत्यङ्मुखाङ्गुली ॥ १३ ॥
दोनों पैरोंको क्रमशः दोनों जाँघोंपर रखकर दोनों घुटनों के निचले भागमें सीधी अँगुलीवाले दोनों हाथ स्थापित करके बैठनेको अत्युत्तम वज्रासन कहा गया है ॥ १३ ॥

करौ विदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् ।
एकं पादमधः कृत्वा विन्यस्योरुं तथोत्तरे ॥ १४ ॥
एक पैरको नीचे करके उसके ऊपर दूसरे पैरका जंघा रखकर योगीको शरीर सीधा करके बैठना चाहिये यह वीरासन कहा गया है ॥ १४ ॥

ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् ।
इडयाऽऽकर्षयेद्‌वायुं बाह्यं षोडशमात्रया ॥ १५ ॥
धारयेत्पूरितं योगी चतुःषष्ट्या तु मात्रया ।
सुषुम्नामध्यगं सम्यग्द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः ॥ १६ ॥
नाड्या पिङ्गलया चैव रेचयेद्योगवित्तमः ।
प्राणायाममिमं प्राहूर्योगशास्त्रविशारदाः ॥ १७ ॥
योगी सोलह बार प्रणवका उच्चारण करने में लगनेवाले समयतक इडा अर्थात् बायीं नासिकासे बाहरकी वायुको खींचे (पूरक), पुनः इस पूरित वायुको चौंसठ बार प्रणवके उच्चारणसमयतक सुषुम्नाके मध्य रोके रहे (कुम्भक) और इसके बाद योगविद्को चाहिये कि बत्तीस बार प्रणवके उच्चारणमें जितना समय लगेउतने समयमें धीर-धरि पिंगला नाडी अर्थात्दायीं नासिकाके द्वारा उस वायुको बाहर करे (रेचक) । योगशास्त्रके विद्वान् इस प्रक्रियाको 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ १५-१७ ॥

भूयो भूयः क्रमात्तस्य बाह्यमेवं समाचरेत् ।
मात्रावृद्धिः क्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश ॥ १८ ॥
इस प्रकार पुनः-पुनः बाहरकी वायुको लेकर क्रमसे पूरक, कुंभक तथा रेचक करके प्राणायामका अभ्यास मात्रा (प्रणवके उच्चारणके समय)-की वृद्धिके अनुसार करना चाहिये । इस प्रकार प्राणायाम पहले बारह बार, तदनन्तर सोलह बार इसके बाद क्रमशः उत्तरोत्तर वृद्धि करनी चाहिये ॥ १८ ॥

जपध्यानादिभिः सार्धं सगर्भं तं विदुर्बुधाः ।
तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः ॥ १९ ॥
जो प्राणायाम [अपने इष्टके] जप-ध्यान आदिसे युक्त होता है, उसे विद्वज्जनोंने सगर्भ प्राणायाम और उस जप-ध्यानसे रहित प्राणायामको विगर्भ प्राणायाम कहा है ॥ १९ ॥

क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्‌गमोऽधमः ।
मध्यमः कम्पसंयुक्तो भूमित्यागः परो मतः ॥ २० ॥
इस प्रकार क्रमसे अभ्यास करते हुए मनुष्यके शरीरमें पसीना आ जाय तो उसे अधम, कम्पन उत्पन्न होनेपर मध्यम और जमीन छोड़कर ऊपर उठनेपर उत्तम प्राणायाम कहा गया है । जबतक उत्तम प्राणायामतक पहुँचा जाय, तबतक अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ २० ॥

उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यावच्छीलनमिष्यते ।
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् ॥ २१ ॥
अपने-अपने विषयों में स्वच्छन्दरूपसे विचरण करती हुई इन्द्रियोंको उन विषयोंसे बलपूर्वक हटानेको प्रत्याहार कहा जाता है ॥ २१ ॥

बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते ।
अङ्गुष्ठगुल्फजानूरुमूलाधोलिङ्गनाभिषु ॥ २२ ॥
हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां ततो नसि ।
भ्रूमध्ये मस्तके मूर्ध्नि द्वादशान्ते यथाविधि ॥ २३ ॥
अँगूठा, एड़ी, घुटना, जाँघ, गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कण्ठ, भूमध्य और मस्तक-इन बारह स्थानोंमें प्राणवायुको विधिपूर्वक धारण किये रखनेको धारणा कहा जाता है ॥ २२-२३ ॥

धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते ।
समाहितेन मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना ॥ २४ ॥
चेतन आत्मामें मनको स्थित करके एकाग्रचित्त होकर अपने भीतर अभीष्ट देवताका सतत चिन्तन करनेको ध्यान कहा जाता है ॥ २४ ॥

आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यानं ध्यानमिहोच्यते ।
समत्वभावना नित्यं जीवात्मपरमात्मनोः ॥ २५ ॥
समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् ।
इदानीं कथये तेऽहं मन्त्रयोगमनुत्तमम् ॥ २६ ॥
मुनियोंने जीवात्मा और परमात्मामें नित्य 'समत्व' भावना रखनेको समाधि कहा है । यह मैंने आपको अष्टांगयोगका लक्षण बतला दिया । अब मैं आपसे उत्कृष्ट मन्त्रयोगका वर्णन कर रही हूँ । २५-२६ ॥

विश्वं शरीरमित्युक्तं पञ्चभूतात्मकं नग ।
चन्द्रसूर्याग्नितेजोभिर्जीवब्रह्मैक्यरूपकम् ॥ २७ ॥
हे नग ! इस पंचभूतात्मक शरीरको 'विश्व' कहा जाता है । चन्द्र, सूर्य और अग्निके तेजसे युक्त होनेपर (इडा-पिंगला-सुषुम्नामें योगसाधनसे) जीवब्रह्मकी एकता होती है । ॥ २७ ॥

तिस्रः कोट्यस्तदर्धेन शरीरे नाडयो मताः ।
तासु मुख्या दश प्रोक्तास्ताभ्यस्तिस्रो व्यवस्थिताः ॥ २८ ॥
प्रधाना मेरुदण्डेऽत्र चन्द्रसूर्याग्ररूपिणी ।
इडा वामे स्थिता नाडी शुभ्रा तु चन्द्ररूपिणी ॥ २९ ॥
शक्तिरूपा तु सा नाडी साक्षादमृतविग्रहा ।
दक्षिणे या पिङ्गलाख्या पुंरूपा सूर्यविग्रहा ॥ ३० ॥
इस शरीरमें साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं । उनमें दस नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं । उनमें भी तीन नाड़ियोंको प्रधान कहा गया है । चन्द्र, सूर्य तथा अग्निस्वरूपिणी-ये नाड़ियाँ मेरुदण्डमें व्यवस्थित रहती हैं । चन्द्ररूपिणी श्वेत 'इडा' नाड़ी उसके बायीं ओर स्थित है । शक्तिरूपा वह इडा नाड़ी साक्षात् अमृतस्वरूपिणी है । दायों ओर जो 'पिंगला' नामक नाड़ी है, वह पुरुषरूपिणी तथा सूर्यमूर्ति है । उनके बीचमें जो सर्वतेजोमयी तथा अग्निरूपिणी नाड़ी स्थित है, वह 'सुषुम्ना' है ॥ २८-३० ॥

सर्वतेजोमयी सा तु सुषुम्ना वह्निरूपिणी ।
तस्या मध्ये विचित्राख्ये इच्छाज्ञानक्रियात्मकम् ॥ ३१ ॥
मध्ये स्वयंभूलिङ्गं तु कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
तदूर्ध्वं मायाबीजं तु हरात्माबिन्दुनादकम् ॥ ३२ ॥
तदूर्ध्वं तु शिखाकारा कुण्डली रक्तविग्रहा ।
देव्यात्मिका तु सा प्रोक्ता मदभिन्ना नगाधिप ॥ ३३ ॥
उसके भीतर 'विचित्रा' नामक नाड़ी स्थित है और उसके भीतर इच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तिसे सम्पन्न करोड़ों सूर्योक तेजके समान स्वयम्भूलिंग है । उसके ऊपर बिन्दुनाद (*)-सहित हरात्मा (हकार, रेफ तथा ईकार)-स्वरूप मायाबीज (ही) विराजमान है । उसके ऊपर रक्त विग्रहवाली शिखाके आकारकी कुण्डलिनी है । हे पर्वतराज हिमालय ! वह देव्यात्मिका कही गयी है और मुझसे अभिन्न है ॥ ३१-३३ ॥

तद्बाह्ये हेमरूपाभं वादिसान्तचतुर्दलम् ।
द्रुतहेमसमप्रख्यं पद्मं तत्र विचिन्तयेत् ॥ ३४ ॥
तदूर्ध्वं त्वनलप्रख्यं षड्दलं हीरकप्रभम् ।
बादिलान्तषड्वर्णेन स्वाधिष्ठानमनुत्तमम् ॥ ३५ ॥
मूलमाधारषट्कोणं मूलाधारं ततो विदुः ।
स्वशब्देन परं लिङ्गं स्वाधिष्ठानं ततो विदुः ॥ ३६ ॥
कुण्डलिनीके बाह्यभागमें स्वर्णवर्णके चतुर्दल कमल [मूलाधार]-का चिन्तन करना चाहिये, जिसपर व, श, ष, स-ये चार बीजाक्षर स्थित हैं । उसके ऊपर छः दलवाला उत्तम स्वाधिष्ठान पद्म स्थित है, जो अग्निके समान तेजोमय, हीरेकी चमकवाला और ब, भ, म, य, र, ल-इन छ: बीजाक्षरोंसे युक्त है । आधार षट्कोणपर स्थित होनेके कारण मूलाधार तथा स्व शब्दसे परम लिंगको इंगित करनेके कारण स्वाधिष्ठान संज्ञा है ॥ ३४-३६ ॥

तदूर्ध्वं नाभिदेशे तु मणिपूरं महाप्रभम् ।
मेघाभं विद्युदाभं च बहुतेजोमयं ततः ॥ ३७ ॥
मणिवद्‌भिन्नं तत्पद्मं मणिपद्मं तथोच्यते ।
दशभिश्च दलैर्युक्तं डादिफान्ताक्षरान्वितम् ॥ ३८ ॥
विष्णुनाधिष्ठितं पद्मं विष्ण्वालोकनकारणम् ।
- इसके ऊपर नाभिदेशमें मेघ तथा विद्युत्के समान कान्तिवाला अत्यन्त तेजसम्पन्न और महान् प्रभासे युक्त मणिपूरक चक्र है । मणिके सदृश प्रभावाला होनेके कारण यह 'मणिपद्म' भी कहा जाता है । यह दस दलोंसे युक्त है और ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ-इन अक्षरोंसे समन्वित है । भगवान् विष्णुके द्वारा अधिष्ठित होनेके कारण यह कमल उनके दर्शनका महान् साधन है ॥ ३७-३८.५ ॥

तदूर्ध्वेऽनाहतं पद्ममुद्यदादित्यसन्निभम् ॥ ३९ ॥
कादिठान्तदलैरर्कपत्रैश्च समधिष्ठितम् ।
तन्मध्ये बाणलिङ्गं तु सूर्यायुतसमप्रभम् ॥ ४० ॥
शब्दब्रह्ममयं शब्दानाहतं तत्र दृश्यते ।
अनाहताख्यं तत्पद्मं मुनिभिः परिकीर्तितम् ॥ ४१ ॥
आनन्दसदनं तत्तु पुरुषाधिष्ठितं परम् ।
उसके ऊपर उगते हुए सूर्यके समान प्रभासे सम्पन्न अनाहत पा है । यह कमल क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ८, ठ-इन अक्षरोंसे युक्त बारह पत्रोंसे प्रतिष्ठित है । उसके मध्यमें दस हजार सूर्योके समान प्रभावाला बाणलिंग स्थित है । बिना किसी आघातके इसमें शब्द होता रहता है । अतः मुनियोंके द्वारा उस शब्दब्रह्ममय पाको 'अनाहत' कहा गया है । परमपुरुषद्वारा अधिष्ठित वह चक्र आनन्दसदन है ॥ ३९-४१.५ ॥

तदूर्ध्वं तु विशुद्धाख्यं दलं षोडशपङ्कजम् ॥ ४२ ॥
स्वरैः षोडशभिर्युक्तं धूम्रवर्णम् महाप्रभम् ।
विशुद्धं तनुते यस्माज्जीवस्य हंसलोकनात् ॥ ४३ ॥
विशुद्धं पद्ममाख्यातमाकाशाख्यं महाद्‌भुतम् ।
उसके ऊपर सोलह दलोंसे युक्त 'विशुद्ध' नामक कमल है । महती प्रभासे युक्त तथा धूम्रवर्णवाला यह कमल अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ऋ, लु, लु, ए, ऐ, ओ, औ, अं अः-इन सोलह स्वरोंसे सम्पन्न है । इसमें हंसस्वरूप परमात्माके दर्शनसे जीव विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीलिये इसे विशुद्ध पद्म (विशुद्ध चक्र) कहा गया है । इस महान् अद्‌भुत कमलको 'आकाशचक्र' भी कहा गया है ॥ ४२-४३.५ ॥

आज्ञाचक्रं तदूर्ध्वं तु आत्मनाधिष्ठितं परम् ॥ ४४ ॥
आज्ञासंक्रमणं तत्र तेनाज्ञेति प्रकीर्तितम् ।
द्विदलं हक्षसंयुक्तं पद्मं तत्सुमनोहरम् ॥ ४५ ॥
उसके ऊपर परमात्माके द्वारा अधिष्ठित श्रेष्ठ 'आज्ञाचक्र' है । उसमें परमात्माकी आज्ञाका संक्रमण होता है, इसीसे उसे 'आज्ञाचक्र'ऐसा कहा गया है । वह कमल दो दलोंवाला, ह तथा क्ष-इन दो अक्षरोंसे युक्त और अत्यन्त मनोहर है । ४४-४५ ॥

कैलासाख्यं तदूर्ध्वं तु रोधिनी तु तदूर्ध्वतः ।
एवं त्वाधारचक्राणि प्रोक्तानि तव सुव्रत ॥ ४६ ॥
सहस्रारयुतं बिन्दुस्थानं तदूर्ध्वमीरितम् ।
इत्येतत्कथितं सर्वं योगमार्गमनुत्तमम् ॥ ४७ ॥
उसके ऊपर कैलास' नामक चक्र और उसके भी ऊपर 'रोधिनी' नामक चक्र स्थित है । हे सुव्रत ! इस प्रकार मैंने आपको आधारचक्रोंके विषयमें बता दिया । इसके और भी ऊपर सहस्र दलोंसे सम्पन्न बिन्दुस्थानरूप 'सहस्सारचक्र' बताया गया है । यह मैंने आपसे सम्पूर्ण श्रेष्ठ योगमार्गका वर्णन कर दिया ॥ ४६-४७ ॥

आदौ पूरकयोगेनाप्याधारे योजयेन्मनः ।
गुदमेढ्रान्तरे शक्तिस्तामाकुञ्च्य प्रबोधयेत् ॥ ४८ ॥
लिङ्गभेदक्रमेणैव बिन्दुचक्रं च प्रापयेत् ।
शम्भुना तां परां शक्तिमेकीभूतां विचिन्तयेत् ॥ ४९ ॥
सर्वप्रथम पूरक प्राणायामके द्वारा मूलाधारमें मन लगाना चाहिये । तत्पश्चात् गुदा और मेढ़के बीचमें वायुके द्वारा कुण्डलिनी शक्तिको समेटकर उसे जाग्रत् करना चाहिये । पुन: लिंग-भेदनके क्रमसे स्वयम्भूलिंगसे आरम्भ करके उस कुण्डलिनी शक्तिको बिन्दुचक्र [सहस्रार]-तक ले जाना चाहिये । इसके बाद उस परा शक्तिका सहस्रारमें स्थित परमेश्वर शम्भुके साथ ऐक्यभावसे ध्यान करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥

तत्रोत्थितामृतं यत्तु द्रुतलाक्षारसोपमम् ।
पाययित्वा तु तां शक्तिं मायाख्यां योगसिद्धिदाम् ॥ ५० ॥
षड्चक्रदेवतास्तत्र सन्तर्प्यामृतधारया ।
आनयेत्तेन मार्गेण मूलाधारं ततः सुधीः ॥ ५१ ॥
वहाँ द्रवीभूत लाक्षारसके समान उत्पन्न अमृतका योगसिद्धि प्रदान करनेवाली माया नामक उस शक्तिको पान कराकर षट्चक्रमें स्थित देवताओंको उस अमृतधारासे सन्तृप्त करे । इसके बाद बुद्धिमान् साधक उसी मार्गसे कुण्डलिनी शक्तिको मूलाधारतक वापस लौटा लाये ॥ ५०-५१ ॥

एवमभ्यस्यमानस्याप्यहन्यहनि निश्चितम् ।
पूर्वोक्तदूषिता मन्त्राः सर्वे सिध्यन्ति नान्यथा ॥ ५२ ॥
जरामरणदुःखाद्यैर्मुच्यते भवबन्धनात् ।
ये गुणाः सन्ति देव्या मे जगन्मातुर्यथा तथा ॥ ५३ ॥
ते गुणाः साधकवरे भवन्त्येव न चान्यथा ।
इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करनेपर साधकके पूर्वोक्त सभी दूषित मन्त्र भी निश्चितरूपसे सिद्ध हो जाते हैं । इसमें सन्देह नहीं है । इसके द्वारा साधक जरा-मरण आदि दु:खों तथा भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है । जो गुण मुझ जगज्जननी भगवतीमें जिस प्रकार विद्यमान हैं, वे सभी गुण उसी प्रकार उस श्रेष्ठ साधकमें उत्पन्न हो जाते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ५२-५३.५ ॥

इत्येवं कथितं तात वायुधारणमुत्तमम् ॥ ५४ ॥
इदानीं धारणाख्यं तु शृणुष्वावहितो मम ।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नदेव्यां चेतो विधाय च ॥ ५५ ॥
तन्मयो भवति क्षिप्रं जीवब्रह्मैक्ययोजनात् ।
अथवा समलं चेतो यदि क्षिप्रं न सिद्ध्यति ॥ ५६ ॥
तदावयवयोगेन योगी योगान्समभ्यसेत् ।
मदीयहस्तपादादावङ्गे तु मधुरे नग ॥ ५७ ॥
चित्तं संस्थापयेन्मन्त्री स्थानस्थानजयात्पुनः ।
विशुद्धचित्तः सर्वस्मिन्‌रूपे संस्थापयेन्मनः ॥ ५८ ॥
यावन्मनो लयं याति देव्यां संविदि पर्वत ।
तावदिष्टमनुं मन्त्री जपहोमैः समभ्यसेत् ॥ ५९ ॥
हे तात ! इस प्रकार मैंने आपसे इस श्रेष्ठ प्राणायामका वर्णन किया है । अब आप सावधान होकर मुझसे धारणा नामक योगका श्रवण कीजिये । दिशा, काल आदिसे अपरिच्छिन्न मुझ भगवतीमें चित्त स्थिर करके जीव और ब्रह्मका ऐक्य हो जानेसे शीघ्र ही साधक तन्मय हो जाता है और यदि चित्तके मलयुक्त रहनेके कारण शीघ्रतापूर्वक सिद्धि प्राप्त न हो तो योगीको चाहिये कि मेरे विग्रहके अंगोंमें [अपना मन स्थित करके] निरन्तर योगका अभ्यास करता रहे । हे पर्वत ! साधकको मेरे करचरणादि मधुर अंगोंमें चित्तको एक-एक करके केन्द्रित करना चाहिये और इस प्रकार विशुद्धचित्त होकर उसे मेरे समस्त रूपमें मनको स्थिर करना चाहिये । हे पर्वत ! जबतक ज्ञानरूपिणी मुझ भगवतीमें मनका लय न हो जाय, तबतक मन्त्रजापकको जप-होमके द्वारा अपने इष्ट मन्त्रका अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ५४-५९ ॥

मन्त्राभ्यासेन योगेन ज्ञेयज्ञानाय कल्पते ।
न योगेन विना मन्त्रो न मन्त्रेण विना हि सः ॥ ६० ॥
द्वयोरभ्यासयोगो हि ब्रह्मसंसिद्धिकारणम् ।
तमः परिवृते गेहे घटो दीपेन दृश्यते ॥ ६१ ॥
एवं मायावृतो ह्यात्मा मनुना गोचरीकृतः ।
इति योगविधिः कृत्स्नः साङ्गः प्रोक्तो मयाऽधुना ।
गुरूपदेशतो ज्ञेयो नान्यथा शास्त्रकोटिभिः॥ ६२ ॥
मन्त्राभ्यास-योगके द्वारा ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जाता है । योगके बिना मन्त्र सिद्ध नहीं होता और मन्त्रके बिना योग सिद्ध नहीं होता । अतः योग और मन्त्र-इन दोनोंका अभ्यास-योग ही ब्रह्मसिद्धिका साधन है । अन्धकारसे आच्छादित घरमें स्थित घड़ा दीपकके प्रकाशमें दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार मायासे आवृत आत्मा मन्त्रके द्वारा दृष्टिगोचर होने लगता है । इस प्रकार मैंने अंगोंसहित सम्पूर्ण योगविधि इस समय आपको बतला दी । गुरुके उपदेशसे ही यह योग जाना जा सकता है, इसके विपरीत करोड़ों शास्त्रोंके द्वारा भी यह प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ६०-६२ ॥

इति श्रीदेवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां
संहितायां सप्तमस्कन्धे देवीगीतायां
मन्त्रसिद्धिसाधनवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
अध्याय पैंतीसवाँ समाप्त ॥ ३५ ॥


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