अतः योगके अंगोंके द्वारा उन विघ्नोंका उच्छेद करके योगियोंको योगकी प्राप्ति करनी चाहिये । योगियोंके लिये योगसिद्धिहेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-ये आठ अंग बताये गये हैं ॥ ४-५ ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयाऽऽर्जवम् । क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ॥ ६ ॥
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, सरलता, क्षमा, धृति, परिमित आहार और शौच-ये दस प्रकारके यम कहे गये हैं ॥ ६ ॥
हे पर्वतराज ! तप, संतोष, आस्तिकता, दान, देवपूजन, शास्वसिद्धान्तोंका श्रवण, लज्जा, सद्बुद्धि, जप और हवन-ये दस नियम मेरे द्वारा कहे गये हैं ॥ ७ ॥
दशैते नियमाः प्रोक्ता मया पर्वतनायक । पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा ॥ ८ ॥ वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपञ्चकम् । ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक्पादतले शुभे ॥ ९ ॥ अङ्गुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः । पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम् ॥ १० ॥
पद्मासन, स्वस्तिकासन, भद्रासन, वज्रासन और वीरासन-क्रमश: ये पाँच आसन बतलाये गये हैं । दोनों पैरोंके दोनों शुभ तलवोंको सम्यक् रूपसे जंघोंपर रखकर पीठकी ओरसे हाथोंको ले जाकर दाहिने हाथसे दाहिने पैरके अंगूठेको और बायें हाथसे बायें पैरके अंगूठेको पकड़े; योगियोंके हृदयमें प्रसन्नता उत्पन्न करनेवाला यह पद्मासन कहा गया है । ८-१० ॥
सीवनीके दोनों ओर दोनों एड़ियोंको अण्डकोषके नीचे अच्छी तरह रखकर दोनों पैरोंको हाथोंसे पकड़कर बैठना चाहिये । योगियोंके द्वारा सम्यक् पूजित यह आसन भद्रासन कहा गया है । ॥ १२ ॥
दोनों पैरोंको क्रमशः दोनों जाँघोंपर रखकर दोनों घुटनों के निचले भागमें सीधी अँगुलीवाले दोनों हाथ स्थापित करके बैठनेको अत्युत्तम वज्रासन कहा गया है ॥ १३ ॥
योगी सोलह बार प्रणवका उच्चारण करने में लगनेवाले समयतक इडा अर्थात् बायीं नासिकासे बाहरकी वायुको खींचे (पूरक), पुनः इस पूरित वायुको चौंसठ बार प्रणवके उच्चारणसमयतक सुषुम्नाके मध्य रोके रहे (कुम्भक) और इसके बाद योगविद्को चाहिये कि बत्तीस बार प्रणवके उच्चारणमें जितना समय लगेउतने समयमें धीर-धरि पिंगला नाडी अर्थात्दायीं नासिकाके द्वारा उस वायुको बाहर करे (रेचक) । योगशास्त्रके विद्वान् इस प्रक्रियाको 'प्राणायाम' कहते हैं ॥ १५-१७ ॥
इस प्रकार पुनः-पुनः बाहरकी वायुको लेकर क्रमसे पूरक, कुंभक तथा रेचक करके प्राणायामका अभ्यास मात्रा (प्रणवके उच्चारणके समय)-की वृद्धिके अनुसार करना चाहिये । इस प्रकार प्राणायाम पहले बारह बार, तदनन्तर सोलह बार इसके बाद क्रमशः उत्तरोत्तर वृद्धि करनी चाहिये ॥ १८ ॥
जपध्यानादिभिः सार्धं सगर्भं तं विदुर्बुधाः । तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः ॥ १९ ॥
जो प्राणायाम [अपने इष्टके] जप-ध्यान आदिसे युक्त होता है, उसे विद्वज्जनोंने सगर्भ प्राणायाम और उस जप-ध्यानसे रहित प्राणायामको विगर्भ प्राणायाम कहा है ॥ १९ ॥
इस प्रकार क्रमसे अभ्यास करते हुए मनुष्यके शरीरमें पसीना आ जाय तो उसे अधम, कम्पन उत्पन्न होनेपर मध्यम और जमीन छोड़कर ऊपर उठनेपर उत्तम प्राणायाम कहा गया है । जबतक उत्तम प्राणायामतक पहुँचा जाय, तबतक अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ २० ॥
उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यावच्छीलनमिष्यते । इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् ॥ २१ ॥
अपने-अपने विषयों में स्वच्छन्दरूपसे विचरण करती हुई इन्द्रियोंको उन विषयोंसे बलपूर्वक हटानेको प्रत्याहार कहा जाता है ॥ २१ ॥
अँगूठा, एड़ी, घुटना, जाँघ, गुदा, लिंग, नाभि, हृदय, ग्रीवा, कण्ठ, भूमध्य और मस्तक-इन बारह स्थानोंमें प्राणवायुको विधिपूर्वक धारण किये रखनेको धारणा कहा जाता है ॥ २२-२३ ॥
चेतन आत्मामें मनको स्थित करके एकाग्रचित्त होकर अपने भीतर अभीष्ट देवताका सतत चिन्तन करनेको ध्यान कहा जाता है ॥ २४ ॥
आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यानं ध्यानमिहोच्यते । समत्वभावना नित्यं जीवात्मपरमात्मनोः ॥ २५ ॥ समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् । इदानीं कथये तेऽहं मन्त्रयोगमनुत्तमम् ॥ २६ ॥
मुनियोंने जीवात्मा और परमात्मामें नित्य 'समत्व' भावना रखनेको समाधि कहा है । यह मैंने आपको अष्टांगयोगका लक्षण बतला दिया । अब मैं आपसे उत्कृष्ट मन्त्रयोगका वर्णन कर रही हूँ । २५-२६ ॥
विश्वं शरीरमित्युक्तं पञ्चभूतात्मकं नग । चन्द्रसूर्याग्नितेजोभिर्जीवब्रह्मैक्यरूपकम् ॥ २७ ॥
हे नग ! इस पंचभूतात्मक शरीरको 'विश्व' कहा जाता है । चन्द्र, सूर्य और अग्निके तेजसे युक्त होनेपर (इडा-पिंगला-सुषुम्नामें योगसाधनसे) जीवब्रह्मकी एकता होती है । ॥ २७ ॥
तिस्रः कोट्यस्तदर्धेन शरीरे नाडयो मताः । तासु मुख्या दश प्रोक्तास्ताभ्यस्तिस्रो व्यवस्थिताः ॥ २८ ॥ प्रधाना मेरुदण्डेऽत्र चन्द्रसूर्याग्ररूपिणी । इडा वामे स्थिता नाडी शुभ्रा तु चन्द्ररूपिणी ॥ २९ ॥ शक्तिरूपा तु सा नाडी साक्षादमृतविग्रहा । दक्षिणे या पिङ्गलाख्या पुंरूपा सूर्यविग्रहा ॥ ३० ॥
इस शरीरमें साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ बतायी गयी हैं । उनमें दस नाड़ियाँ मुख्य कही गयी हैं । उनमें भी तीन नाड़ियोंको प्रधान कहा गया है । चन्द्र, सूर्य तथा अग्निस्वरूपिणी-ये नाड़ियाँ मेरुदण्डमें व्यवस्थित रहती हैं । चन्द्ररूपिणी श्वेत 'इडा' नाड़ी उसके बायीं ओर स्थित है । शक्तिरूपा वह इडा नाड़ी साक्षात् अमृतस्वरूपिणी है । दायों ओर जो 'पिंगला' नामक नाड़ी है, वह पुरुषरूपिणी तथा सूर्यमूर्ति है । उनके बीचमें जो सर्वतेजोमयी तथा अग्निरूपिणी नाड़ी स्थित है, वह 'सुषुम्ना' है ॥ २८-३० ॥
उसके भीतर 'विचित्रा' नामक नाड़ी स्थित है और उसके भीतर इच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तिसे सम्पन्न करोड़ों सूर्योक तेजके समान स्वयम्भूलिंग है । उसके ऊपर बिन्दुनाद (*)-सहित हरात्मा (हकार, रेफ तथा ईकार)-स्वरूप मायाबीज (ही) विराजमान है । उसके ऊपर रक्त विग्रहवाली शिखाके आकारकी कुण्डलिनी है । हे पर्वतराज हिमालय ! वह देव्यात्मिका कही गयी है और मुझसे अभिन्न है ॥ ३१-३३ ॥
कुण्डलिनीके बाह्यभागमें स्वर्णवर्णके चतुर्दल कमल [मूलाधार]-का चिन्तन करना चाहिये, जिसपर व, श, ष, स-ये चार बीजाक्षर स्थित हैं । उसके ऊपर छः दलवाला उत्तम स्वाधिष्ठान पद्म स्थित है, जो अग्निके समान तेजोमय, हीरेकी चमकवाला और ब, भ, म, य, र, ल-इन छ: बीजाक्षरोंसे युक्त है । आधार षट्कोणपर स्थित होनेके कारण मूलाधार तथा स्व शब्दसे परम लिंगको इंगित करनेके कारण स्वाधिष्ठान संज्ञा है ॥ ३४-३६ ॥
- इसके ऊपर नाभिदेशमें मेघ तथा विद्युत्के समान कान्तिवाला अत्यन्त तेजसम्पन्न और महान् प्रभासे युक्त मणिपूरक चक्र है । मणिके सदृश प्रभावाला होनेके कारण यह 'मणिपद्म' भी कहा जाता है । यह दस दलोंसे युक्त है और ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ-इन अक्षरोंसे समन्वित है । भगवान् विष्णुके द्वारा अधिष्ठित होनेके कारण यह कमल उनके दर्शनका महान् साधन है ॥ ३७-३८.५ ॥
उसके ऊपर उगते हुए सूर्यके समान प्रभासे सम्पन्न अनाहत पा है । यह कमल क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ८, ठ-इन अक्षरोंसे युक्त बारह पत्रोंसे प्रतिष्ठित है । उसके मध्यमें दस हजार सूर्योके समान प्रभावाला बाणलिंग स्थित है । बिना किसी आघातके इसमें शब्द होता रहता है । अतः मुनियोंके द्वारा उस शब्दब्रह्ममय पाको 'अनाहत' कहा गया है । परमपुरुषद्वारा अधिष्ठित वह चक्र आनन्दसदन है ॥ ३९-४१.५ ॥
उसके ऊपर सोलह दलोंसे युक्त 'विशुद्ध' नामक कमल है । महती प्रभासे युक्त तथा धूम्रवर्णवाला यह कमल अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ ऋ, लु, लु, ए, ऐ, ओ, औ, अं अः-इन सोलह स्वरोंसे सम्पन्न है । इसमें हंसस्वरूप परमात्माके दर्शनसे जीव विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है, इसीलिये इसे विशुद्ध पद्म (विशुद्ध चक्र) कहा गया है । इस महान् अद्भुत कमलको 'आकाशचक्र' भी कहा गया है ॥ ४२-४३.५ ॥
उसके ऊपर परमात्माके द्वारा अधिष्ठित श्रेष्ठ 'आज्ञाचक्र' है । उसमें परमात्माकी आज्ञाका संक्रमण होता है, इसीसे उसे 'आज्ञाचक्र'ऐसा कहा गया है । वह कमल दो दलोंवाला, ह तथा क्ष-इन दो अक्षरोंसे युक्त और अत्यन्त मनोहर है । ४४-४५ ॥
उसके ऊपर कैलास' नामक चक्र और उसके भी ऊपर 'रोधिनी' नामक चक्र स्थित है । हे सुव्रत ! इस प्रकार मैंने आपको आधारचक्रोंके विषयमें बता दिया । इसके और भी ऊपर सहस्र दलोंसे सम्पन्न बिन्दुस्थानरूप 'सहस्सारचक्र' बताया गया है । यह मैंने आपसे सम्पूर्ण श्रेष्ठ योगमार्गका वर्णन कर दिया ॥ ४६-४७ ॥
सर्वप्रथम पूरक प्राणायामके द्वारा मूलाधारमें मन लगाना चाहिये । तत्पश्चात् गुदा और मेढ़के बीचमें वायुके द्वारा कुण्डलिनी शक्तिको समेटकर उसे जाग्रत् करना चाहिये । पुन: लिंग-भेदनके क्रमसे स्वयम्भूलिंगसे आरम्भ करके उस कुण्डलिनी शक्तिको बिन्दुचक्र [सहस्रार]-तक ले जाना चाहिये । इसके बाद उस परा शक्तिका सहस्रारमें स्थित परमेश्वर शम्भुके साथ ऐक्यभावसे ध्यान करना चाहिये ॥ ४८-४९ ॥
वहाँ द्रवीभूत लाक्षारसके समान उत्पन्न अमृतका योगसिद्धि प्रदान करनेवाली माया नामक उस शक्तिको पान कराकर षट्चक्रमें स्थित देवताओंको उस अमृतधारासे सन्तृप्त करे । इसके बाद बुद्धिमान् साधक उसी मार्गसे कुण्डलिनी शक्तिको मूलाधारतक वापस लौटा लाये ॥ ५०-५१ ॥
एवमभ्यस्यमानस्याप्यहन्यहनि निश्चितम् । पूर्वोक्तदूषिता मन्त्राः सर्वे सिध्यन्ति नान्यथा ॥ ५२ ॥ जरामरणदुःखाद्यैर्मुच्यते भवबन्धनात् । ये गुणाः सन्ति देव्या मे जगन्मातुर्यथा तथा ॥ ५३ ॥ ते गुणाः साधकवरे भवन्त्येव न चान्यथा ।
इस प्रकार प्रतिदिन अभ्यास करनेपर साधकके पूर्वोक्त सभी दूषित मन्त्र भी निश्चितरूपसे सिद्ध हो जाते हैं । इसमें सन्देह नहीं है । इसके द्वारा साधक जरा-मरण आदि दु:खों तथा भवबन्धनसे मुक्त हो जाता है । जो गुण मुझ जगज्जननी भगवतीमें जिस प्रकार विद्यमान हैं, वे सभी गुण उसी प्रकार उस श्रेष्ठ साधकमें उत्पन्न हो जाते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ५२-५३.५ ॥
हे तात ! इस प्रकार मैंने आपसे इस श्रेष्ठ प्राणायामका वर्णन किया है । अब आप सावधान होकर मुझसे धारणा नामक योगका श्रवण कीजिये । दिशा, काल आदिसे अपरिच्छिन्न मुझ भगवतीमें चित्त स्थिर करके जीव और ब्रह्मका ऐक्य हो जानेसे शीघ्र ही साधक तन्मय हो जाता है और यदि चित्तके मलयुक्त रहनेके कारण शीघ्रतापूर्वक सिद्धि प्राप्त न हो तो योगीको चाहिये कि मेरे विग्रहके अंगोंमें [अपना मन स्थित करके] निरन्तर योगका अभ्यास करता रहे । हे पर्वत ! साधकको मेरे करचरणादि मधुर अंगोंमें चित्तको एक-एक करके केन्द्रित करना चाहिये और इस प्रकार विशुद्धचित्त होकर उसे मेरे समस्त रूपमें मनको स्थिर करना चाहिये । हे पर्वत ! जबतक ज्ञानरूपिणी मुझ भगवतीमें मनका लय न हो जाय, तबतक मन्त्रजापकको जप-होमके द्वारा अपने इष्ट मन्त्रका अभ्यास करते रहना चाहिये ॥ ५४-५९ ॥
मन्त्राभ्यासेन योगेन ज्ञेयज्ञानाय कल्पते । न योगेन विना मन्त्रो न मन्त्रेण विना हि सः ॥ ६० ॥ द्वयोरभ्यासयोगो हि ब्रह्मसंसिद्धिकारणम् । तमः परिवृते गेहे घटो दीपेन दृश्यते ॥ ६१ ॥ एवं मायावृतो ह्यात्मा मनुना गोचरीकृतः । इति योगविधिः कृत्स्नः साङ्गः प्रोक्तो मयाऽधुना । गुरूपदेशतो ज्ञेयो नान्यथा शास्त्रकोटिभिः॥ ६२ ॥
मन्त्राभ्यास-योगके द्वारा ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो जाता है । योगके बिना मन्त्र सिद्ध नहीं होता और मन्त्रके बिना योग सिद्ध नहीं होता । अतः योग और मन्त्र-इन दोनोंका अभ्यास-योग ही ब्रह्मसिद्धिका साधन है । अन्धकारसे आच्छादित घरमें स्थित घड़ा दीपकके प्रकाशमें दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार मायासे आवृत आत्मा मन्त्रके द्वारा दृष्टिगोचर होने लगता है । इस प्रकार मैंने अंगोंसहित सम्पूर्ण योगविधि इस समय आपको बतला दी । गुरुके उपदेशसे ही यह योग जाना जा सकता है, इसके विपरीत करोड़ों शास्त्रोंके द्वारा भी यह प्राप्त नहीं किया जा सकता ॥ ६०-६२ ॥